धनतेरस पर विशेष-बर्तनों की खरीदारी या सेहत की तैयारी:

 क्या है हमारी धनतेरस का असली विज्ञान? 
                                  - ईशान पाठक (कक्षा 9) 
 जब भी धनतेरस आती है, हमारे घरों में एक अजीब सा उत्साह आ जात है। जैसे - बाजार जाओ, कुछ भी खरीदो, बस कोई धातु (मेटल) घर लेकर आना है। कोई चम्मच ला रहा है, तो कोई सोने का सिक्का। हम सब यही मान लेते हैं कि यह सिर्फ लक्ष्मी जी को खुश करने और तिजोरी भरने का एक तरीका है। लेकिन अगर आप इस पूरी परंपरा को आधुनिक विज्ञान और क्वांटम फिजिक्स के नजरिए से देखें, तो हमारे पूर्वजों ने इस दिन की शुरुआत सिर्फ धर्म के भरोसे नहीं, बल्कि शुद्ध विज्ञान के आधार पर की थी।

 पहले थोड़ी पुरानी कहानी समझते हैं, फिर सीधे फिजिक्स परआते हैं। धनतेरस का असली नाम 'धन्वंतरि त्रयोदशी' है। माना जाता है कि इस दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि निकले थे, जिन्हें आयुर्वेद का पिता यानी दुनिया का पहला डॉक्टर कहा जाता है। उनके हाथ में एक कलश था, जिसमें 'अमृत' भरा था। अब यहाँ एक बहुत गहरी सोचने वाली बात है। दीवाली के पांच दिनोंके त्योहार की शुरुआत धन (यानी नोटों ) से नहीं हो रही है, बल्कि धन्वंतरि (यानी अच्छी सेहत) से हो रही है। कहा भी गया है - पहला सुख निरोगी काया। अगर शरीर ही बीमार है, तो आपकी अरबों की दौलत सिर्फ एक नंबर बनकर रह जाएगी।

 अब आते हैं उस बात पर जो सबसे मजेदार है—क्वांटम फिजिक्स और बर्तनों का कनेक्शन।

विज्ञान का एक बुनियादी नियम है— (लॉ ऑफ कंजर्वेशन ऑफ एनर्जी)। इसके मुताबिक ब्रह्मांड में ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही खत्म किया जा सकता है, इसे सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। आइंस्टीन ने भी कहा था कि इस दुनिया में जो कुछ भी हमें ठोस दिखाई देता है, वह असल में कुछ नहीं बल्कि एक बहुत ही गाढ़े रूप में जमा हुई ऊर्जा है।
                           ईशान पाठक

   हमारे पूर्वज इस बात को बहुत अच्छे से जानते थे। जब उन्होंने धनतेरस के दिन पीतल, तांबा या चांदी खरीदने का नियम बनाया, तो वह कोई अंधविश्वास नहीं था। धातुएं ऊर्जा की सबसे अच्छी संवाहक (कंडक्टर) होती हैं। वे अपने आसपास की सकारात्मक ऊर्जा और तरंगों को बहुत तेजी से सोखती हैं। पुराने जमाने में लोग जब पीतल या तांबे के बर्तनों में पानी रखते थे या खाना खाते थे, तो वह धातु पानी के भीतर के ढांचे को बदल देती थी। उसमें छिपे हुए गुण पानी के जरिए हमारे शरीर में जाते थे और हमारी बीमारियों से लड़ने की ताकत बढ़ाते थे। धन्वंतरि का अमृत कोई जादुई पानी नहीं था, बल्कि सही धातु के बर्तन में रखा हुआ शुद्ध और चार्ज्ड पानी ही वह अमृत था जो इंसानी शरीर को बीमारियों से बचाता था।

   दूसरा पहलू है हमारी सोच का। जब पूरा समाज एक ही दिन, एक ही समयपर खुशहाली, सेहत और अच्छी, सोच के साथ बाजारों में निकलता है, तो वह सामूहिक सोच एक बहुत बड़ा ऊर्जा क्षेत्र (एनर्जी फील्ड) तैयार करती है। घर में नया बर्तन लाना सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि अपने घर की नकारात्मक ऊर्जा को कम करके एक नई, बेहतर ऊर्जा को बुलाना है।

  यहाँ तक कि इस दिन शाम को यमराज के नाम का जो दीया घर के बाहर जलाया जाता है, वह भी अकाल मृत्यु के डर को खत्म करने का एक दिमागी तरीका है। डर भी एक ऊर्जा है, जो हमारी सेहत को कमजोर करती है। उस डर को दीये की रोशनी में जलाकर हम अपने दिमाग को पूरी तरह से शांत और मजबूत करते हैं। तो इस बार जब आप धनतेरस पर कोई बर्तन या सिक्का खरीदने बाजार जाएं, तो खुद को सिर्फ एक खरीदार मत समझिएगा।

 याद रखिएगा कि आप उस समय ब्रह्मांड की ऊर्जा को अपने पक्ष में मोड़ने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं। असली धन आपकी तिजोरी में बंद सोना नहीं है, बल्कि आपके भीतर धड़कने वाली वह सेहतमंद ऊर्जा है, जिसे धन्वंतरि अमृत कहकर गए थे।

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