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मेरे लिए केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि शरीर के एक अंग के समान थे अशोक यादव: रामगोविन्द

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सपा के वरिष्ठ नेता अशोक यादव के आकस्मिक निधन से पूरे समाजवादी परिवार में गहरा शोक बलिया। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि बेरुआरबरी अशोक यादव के आकस्मिक निधन की खबर से पूरे समाजवादी परिवार में गहरा शोक और स्तब्धता का माहौल है। उनके असमय निधन से न केवल पार्टी ने एक समर्पित, कर्मठ और जुझारू नेता को खो दिया है, बल्कि समाज ने एक सजग, संवेदनशील और जनसेवा के प्रति पूर्णतः समर्पित व्यक्तित्व को खो दिया है। यह क्षति अपूरणीय है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष श्री रामगोविन्द चौधरी ने अत्यंत भावुक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि अशोक यादव मेरे लिए केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि मेरे शरीर के एक अंग के समान थे। उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से असहनीय पीड़ा का विषय है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोक संतप्त परिवार को इस दुःख की घड़ी में संबल प्रदान करें। मैं यह संकल्प लेता हूँ कि जीवनपर्यंत उनके परिवार के साथ खड़ा रहूँगा और हर परिस्थिति में उनका सहयोग करूंगा। समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता ...

जनता को भाषण नहीं बल्कि राशन और शासन में चाहिए अपनी हिस्सेदारी: रामगोविन्द

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बजट आंकड़ों का मायाजाल या उम्मीदों का झुनझुना बलिया। ह र साल जब वित्त मंत्री लाल ब्रीफकेस (या अब डिजिटल टैबलेट) लेकर संसद की सीढ़ियां चढ़ती हैं, तो देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस उम्मीद में टिकी होती हैं कि शायद इस बार उनकी थाली में रोटी और जेब में कुछ बचत के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन संसद के भीतर मेजों की गड़गड़ाहट और बाहर आम आदमी की खामोशी के बीच का अंतर इस बार भी कम होता नहीं दिख रहा। मेजों की गड़गड़ाहट और कागजों का पुलिंदा संसद के भीतर जब वित्त मंत्री बजट भाषण की एक-एक पंक्ति पढ़ती हैं, तो सत्ता पक्ष के सांसद उसे ऐतिहासिक बताते हुए मेजें थपथपाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह भाषण समाप्त होता है और संसद की चौखट से बाहर आता है, तो जनता के हाथ में केवल 'बजट की प्रतियां' ही होती हैं—अधिकारों और राहत का वह वास्तविक हिस्सा गायब रहता है जिसकी उसे दरकार थी।                            रामगोविन्द चौधरी किसान, मजदूर और नौजवान: हाशिये पर खड़े लोग इस बजट को यदि बारीकी से देखा जाए, तो समाज के उन स्तंभो...