अमावस्या का अंधकार, वैकुंठ का रहस्य और विज्ञान का सच :ईशान पाठक
वैकुंठ का रहस्य और शत्रुता में छिपी परम भक्ति-
जब हम दीवाली की रात को इस घने अंधेरे (अमावस्या) के बीच अपने घरों की चौखट पर छोटे-छोटे दीये जलाते हैं, तो दिमाग में बस एक ही बात आती है कि हम एक दुश्मन की हार और भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी मना रहे हैं। पर क्या रावण सच में सिर्फ एक दुश्मन था? अगर हम अपनी सनातन परंपरा को थोड़ा गहराई से देखें, तो पता चलेगा कि इस पूरी कहानी की स्क्रिप्ट तो बहुत पहले ही वैकुंठ धाम में लिखी जा चुकी थी।
जिसे हम लंका का राजा रावण कहते हैं, वह असल में भगवान विष्णु के सबसे खास और वफादार द्वारपाल 'जय' थे, और उनके भाई कुंभकर्ण दूसरे द्वारपाल 'विजय' के अवतार थे। किस्सा कुछ ऐसा है कि एक बार ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र—सनत्कुमार ऋषियों का वैकुंठ आना हुआ। ये ऋषि बहुत ज्ञानी थे और उनकी उम्र करोड़ों साल थी, लेकिन अपनी शक्तियों की वजह से वे हमेशा पाँच साल के छोटे बच्चों जैसे ही दिखते थे। जय और विजय उन्हें पहचान नहीं पाए और बच्चा समझकर अंदर जाने से रोक दिया। ऋषियों को यह बात बुरी लगी, उन्होंने कहा कि नारायण के दरबार में तो सब बराबर हैं, यहाँ भेदभाव क्यों? और इसी गुस्से में उन्होंने दोनों को धरती पर जन्म लेने का शाप दे दिया।
दोनों दुखी होकर जब भगवान विष्णु के पास पहुंचे, तो भगवान ने कहा कि ऋषियों का शाप वापस नहीं हो सकता। पर अपने प्रभु से सालों तक दूर रहना उन दोनों के लिए सबसे बड़ा दर्द था। तब भगवान विष्णु ने उन्हें दो विकल्प दिए—या तो सात जन्म तक भगवान का दोस्त बनकर धरती पर रहो, या फिर सिर्फ तीन जन्म के लिए उनके सबसे बड़े दुश्मन बन जाओ। जय और विजय ने सात जन्म तक प्रभु से दूर रहने के बजाय तीन जन्म की कट्टर दुश्मनी को चुना, ताकि काम जल्दी खत्म हो और वे वापस घर लौट सकें।
इसके बाद वे तीन जन्म तक राक्षस बनकर जन्मे। पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने, जिनको भगवान ने वराह और नृसिंह अवतार लेकर मुक्ति दी। दूसरे जन्म में वे रावण और कुंभकर्ण बने, जिनका अंत श्रीराम के हाथों हुआ। और तीसरे जन्म में वे शिशुपाल और दंतवक्र बनकर आए, जिनको श्रीकृष्ण ने मारकर वापस वैकुंठ का द्वारपाल बना दिया।
रावण ने दुश्मनी इसलिए चुनी क्योंकि वह जानता था कि दुश्मन बनकर भगवान के हाथों मरने से मुक्ति जल्दी मिलेगी। यानी, रावण का घमंड और श्रीराम की लीला, दोनों एक बहुत बड़े 'कॉस्मिक प्लान' का हिस्सा थे। रावण कोई आम राजा नहीं था, वह ऐसा महापंडित था जिसे पूरे ब्रह्मांड की चाल और एस्ट्रोनॉमी का ज्ञान था। इसलिए दीवाली सिर्फ एक युद्ध का अंत नहीं है, बल्कि एक भक्त की अपने भगवान से मिलने की तड़प और शाप से आज़ादी का पर्व है।
अगर रावण की यह दुश्मनी भी भगवान से वापस मिलने का एक प्लान थी, तो फिर जिसे हम 'बुराई' कहते हैं, क्या वह सच में बुराई है? या फिर हर इंसान के अंदर एक राम और एक रावण दोनों एक साथ रहते हैं—बिलकुल फिजिक्स के 'वेव-पार्टिकल डुअलिटी' की तरह?
इंसानी फितरत का विरोधाभास और द्वैत_
फिजिक्स में एक बहुत ही दिलचस्प थ्योरी है 'वेव पार्टिकल डुएलिटी'। यह कहती है कि जो लाइट (प्रकाश) है, वह एक ही समय पर वेव भी है और कण (पर्टिकल) भी। वह कैसा बर्ताव करेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसे देख कैसे रहे हो। कुछ ऐसा ही चक्कर इंसान के दिमाग और उसकी फितरत का भी है। जब हम रावण के पुतले को जलाकर खुश होते हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि रावण कोई बाहर का व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह हमारे ही अंदर छुपी एक सोच है।
अब यहाँ एक ऐसा सवाल खड़ा होता है जो हमारी सोच को हिला देता है। अगर रावण जैसा महा-ज्ञानी भी अपने अंदर के अहंकार और जलन से नहीं बच पाया, तो हमारी क्या औकात है? हम हर साल दशहरे और दीवाली पर बाहर के पुतलों को जलाकर खुश तो हो जाते हैं, पर अपने अंदर बैठे उस रावण का क्या करते हैं जो रोज़ हमारे दिमाग में पनपता है?
इस दुनिया में कोई भी इंसान सौ प्रतिशत अच्छा या बुरा नहीं होता। हम सब बीच वाले हैं ( ग्रे एरिया, न सफेद,न पूरी तरीके से काला)। एक ही इंसान अपने परिवार के लिए सबसे अच्छा हो सकता है और बाहर वालों के लिए सबसे बुरा। अब सोचने वाली बात यह है—क्या अच्छाई और बुराई सच में दो अलग-अलग चीज़ें हैं? या फिर ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो हालात के हिसाब से बदलते हैं? क्या हम दीवाली पर बाहर के अंधेरे को हरा रहे हैं, या अपने अंदर के अंधेरे से भाग रहे हैं?
इंसान के अंदर की यह डुअलिटी तो फिर भी छोटी है, पर जब हम अपनी नज़र इस धरती से हटाकर ऊपर आकाश की तरफ उठाते हैं, तब समझ आता है कि साइंस की भाषा में इस 'अंधेरे और उजाले' का असली खेल क्या है। आइए अब चलते हैं कॉस्मोलॉजी के उस सफर पर, जहाँ हमारी दीवाली पूरे ब्रह्मांड के एक बहुत बड़े रहस्य से जाकर जुड़ जाती है।
खगोल विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) और दीवाली का अनोखा कनेक्शन
अब जरा अपनी नजरें इस धरती से हटाकर ऊपर अनंत आकाश की तरफ ले चलते हैं। अगर हम कॉस्मोलॉजी (खगोल विज्ञान) के नजरिये से देखें, तो दीवाली का यह त्योहार एक बिल्कुल नए रूप में सामने आता है। आज का मॉडर्न साइंस कहता है कि यह पूरा ब्रह्मांड असल में अंधेरे के एक बहुत बड़े समंदर में तैर रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, हमारे ब्रह्मांड का लगभग 95% हिस्सा 'डार्क मैटर' और 'डार्क एनर्जी' से बना है, जो पूरी तरह से काला और अदृश्य है। सिर्फ 5% हिस्सा ही ऐसा है जिसे हम देख सकते हैं—जैसे सारे तारे, सूर्य, गैलेक्सी और हम इंसान। यानी साइंस के हिसाब से भी, रोशनी इस ब्रह्मांड में एक बहुत छोटी सी माइनॉरिटी (अल्पसंख्या) में है।
अब इस बात को हमारी दीवाली से जोड़कर देखिए। दीवाली हमेशा कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाई जाती है, जो पूरे साल की सबसे घनी और काली रात होती है। धार्मिक तौर पर हम कहते हैं कि श्रीराम के आने की खुशी में दीये जलाए गए थे। लेकिन अगर साइंस और रिलिजन को एक साथ रखें, तो समझ आता है कि उस काली रात में करोड़ों दीये जलाना असल में इंसानी दिमाग की एक बहुत पुरानी जिद थी।
इंसान का स्वभाव है कि उसे अंधेरे से डर लगता है और वह रोशनी की तलाश करता है। जब ब्रह्मांड का 95% अंधेरा हमें डराने की कोशिश करता है, तब हम मिट्टी का एक छोटा सा दीया जलाकर उस अनंत अंधकार को चुनौती देते हैं। यह दीया इस बात का सबूत है कि भले ही अंधेरा कितना भी बड़ा हो, हम अपनी रोशनी वाली 5% की जिद को कभी नहीं छोड़ेंगे।
भगवान विष्णु का ब्रह्मांडीय स्वरूप -
अंधेरे और उजाले का यह जो खेल हम अंतरिक्ष में देखते हैं, हमारे पुराणों में भगवान विष्णु का स्वरूप बिल्कुल वैसा ही दिखाया गया है। विष्णु जी को 'अनंत' कहा गया है, जो समय और स्पेस के परे हैं। जब हम उनके 'विश्वरूप' की कल्पना करते हैं, तो उसमें करोड़ों आकाशगंगाएं और तारे समाए हुए दिखते हैं।
देखा जाए तो भगवान विष्णु ही वह कॉस्मिक एनर्जी हैं जो इस पूरे ब्रह्मांड को चला रही है। उनके अवतारों की कहानी भी एक तरह से इवोल्यूशन और कॉस्मोलॉजी की थ्योरी जैसी है। जैसे पहले पानी से जीवन शुरू हुआ तो 'वराह' और 'मत्स्य' अवतार आए, फिर इंसान और जानवर का मिक्स 'नृसिंह' अवतार आया, और बाद में पूर्ण मानव रूप में श्रीराम और श्रीकृष्ण आए। लंका का युद्ध या वैकुंठ का श्राप, ये सब दरअसल उस परम शक्ति के बनाए हुए नियम हैं, ताकि ब्रह्मांड का बैलेंस बना रहे।
तो इस बार जब आप दीवाली की रात को अपने हाथों में एक जलता हुआ दीया लेकर मुंडेर पर रखने जाएं, तो एक पल के लिए रुककर जरूर सोचिएगा। क्या आप सिर्फ एक त्योहार मना रहे हैं? या फिर आप विज्ञान, दर्शन और धर्म के उस चौराहे पर खड़े हैं जहाँ सब कुछ एक हो जाता है?
फैसला अब आपको करना है कि आप इस दीवाली को किस नजरिए से देखते हैं। क्या यह सिर्फ अयोध्या की एक पुरानी कहानी है, या फिर इस ठंडे और विशाल ब्रह्मांड में खुद को अकेला पाकर रोशनी से दिल को तसल्ली देने का एक जरिया? सच जो भी हो, पर एक दीये की रोशनी में राम और रावण की यह कहानी हमें हमेशा याद दिलाती रहेगी कि जब तक हमारे भीतर की चेतना जाग रही है, तब तक ब्रह्मांड का कोई भी अंधेरा हमें हरा नहीं सकता।
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