काल का नाश करने वाली हैं 'कालरात्रि', फिर भी हैं 'शुभंकरी'
-डाॅ. गणेश पाठक
नवरात्र के सातवें दिन अर्थात् सप्तमी के दिन नवदुर्गा के सातवें स्वरूप मां 'कालरात्रि' की उपासना एवं पूजा -अर्चना का प्राविधान है। यद्यपि कि मां कालरात्रि का स्वरूप अति भयानक होता है, किंतु मां भक्तों के लिए सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली एवं शुभकारी हैं, इसीलिए इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है।
मां कालरात्रि को 'महायोगिनी' एवं 'महायोगीश्वरी' भी कहा जाता है। मां कालरात्रि का वर्ण श्याम वर्ण (अत्यन्त काला) है। इनकी सवारी गर्दभ (गधा) है। मां जब गर्दभ पर सवार होकर निकलती हैं तो उनके बाल लम्बे एवं बिखरे हुए होते हैं तथा गले में धारण करने वाली माला विद्युत के समान अति चमकीली होती है। उनके त्रिनेत्र ब्रह्माण्ड की तरह गोलाकार हैं, जिनमें से तेज अग्नि की लपटें निकलती रहती हैं। मां के मुख से भी अग्नि की भयंकर लपटें निकलती रहती है।
मां कालरात्रि की चार भुजाएं हैं, जिनमें से एक हाथ में चमचमाती तेज धार वाली तलवार धारण की हुई रहती हैं, जबकि दूसरे हाथ में लोहे की कील धारण की हुई हैं, जिससे दुष्टों का संहार करती हैं। मां का तीसरा एवं चौथा हाथ क्रमश: वरमुद्रा एवं अभय मुद्रा के रूप में है। मां स्वरूप यद्यपि कि अत्यन्त भयानक दिखाई देता है, किंतु मां का भयानक स्वरूप केवल दुष्टों का संहार करने के लिए होता है। अपने भक्तों के लिए तो मां कालरात्रि सदैव कल्याणकारी, शुभकारी एवं वरदाई होती हैं।
चूंकि मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं एवं इनकी पूजा आधी रात को की जाती है, इसीलिए इन्हें कालरात्रि कहा जाता। मां के भयानक स्वरूप को देखकर भूत-प्रेत , राक्षस आदि भाग जाते हैं। मां की श्वास से निकलने वाली अग्नि की भयानक लपटों से शत्रु जल कर भस्म हो जाते हैं। मां कालरात्रि द्वारा ही रक्त - बीज जैसे मायावी राक्षस का बध करके सबको भयमुक्त किया गया।
मां कालरात्रि की उपासना एवं पूजा - अर्चना करने से अग्नि , जल, खतरनाक जीव -जंतुओं से एवं शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता है। इस तरह मां कालरात्रि की उपासना से भक्त प्रत्येक प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है तथा प्रत्येक प्रकार की सकारात्मक शक्ति को प्राप्त पर अपनी समस्याओं से छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
प्रात: काल स्नान करके एवं स्वच्छ वस्त्र धारण कर विधि - विधान से मां कालरात्रि की पूजा - अर्चना करनी चाहिए। मां को अक्षत, धूपगंध, रातरानी का अति सुगंधित पुष्प, गुड़ एवं नैवेद्य अर्पित कर पूजा करनी चाहिए और पूजा के अंत में आरती अवश्य करनी चाहिए।
सप्तमी तिथि की रात को विशेष विधि - विधान से मां कालरात्रि की उपासना एवं पूजा - अर्चना करने से मां प्रसन्न होती है, जिससे ऐसी पूजा विशेष फलदाई होता है और भक्त सर्व बाधा से मुक्त होकर अपनी सभी सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है।
मंत्र -
1. ऊं ऐं ह्लीं क्लीं
चामुण्डायै विच्चै
मां कालरात्रि
दैव्ये नम:।
2. या देवी सर्व भूतेषु,
कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै,
नमस्तस्यै नमो नम:।।
3.वामयादोल्ल सल्लोह,
लता कण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा,
कालटाविर्भयंकरी ।।
जय मां कालरात्रि।
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