इस बार लौटेगी पशु मेले की पुरानी शान

पूजा-अर्चना के साथ बलिया में ददरी मेले के शुरुआत का शुभारंभ
बलिया। पूर्वांचल की धरती पर आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव कहे जाने वाले ऐतिहासिक ददरी मेले का आगाज हो गया है। नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष संत कुमार उर्फ मिठाईलाल ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर ध्वजारोहण किया और मेले की शुरुआत का शुभारंभ किया। इस मौके पर मेले को लेकर उत्साह और उम्मीदों का माहौल नजर आया। अध्यक्ष ने साफ कहा कि इस बार ददरी मेला खास होने जा रहा है। वर्षों से परिस्थितियों के कारण प्रभावित रहा पशु मेला भी इस बार भव्य स्वरूप में आयोजित करने की तैयारी है।

पशु मेला है ददरी की धड़कन, इस बार दिखेगी पुरानी रौनक
ददरी मेले की पहचान सिर्फ झूलों, दुकानों और मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसकी असली आत्मा उसका ऐतिहासिक पशु मेला है, जिसे ददरी की धड़कन कहा जाता है। घोड़ों की टाप, पशुओं की खरीद-बिक्री, दूर-दराज से आने वाले पशुपालकों और व्यापारियों की चहल-पहल इस मेले को अलग पहचान देती है। इस बार पशु मेले को भव्यता के साथ सजाने की तैयारी है, जिससे पुरानी परंपरा को फिर से नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है।

परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह और पुलिस अधीक्षक इरज राजा की देखरेख में मेले की व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियां की जा रही हैं। दीपावली से पशु मेले की शुरुआत होगी, जबकि कार्तिक पूर्णिमा से पूरा ददरी मेला अपनी रंगीन रौनक के साथ गुलजार हो उठेगा।

मीना बाजार से भारतेंदु मंच तक, हर तरफ होगा मनोरंजन
करीब 26 दिनों तक चलने वाले इस मेले में महिलाओं के लिए खास मीना बाजार आकर्षण का केंद्र बनेगा। वहीं, तरह-तरह के झूले, खानपान की दुकानें, खरीदारी के स्टॉल और मनोरंजन के अनेक साधन लोगों को अपनी ओर खींचेंगे। भारतेंदु मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की महफिल सजेगी, जहां लोककला, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां मेले की शामों को यादगार बनाएंगी।

बच्चों की खिलखिलाहट, परिवारों की खरीदारी, जायकेदार व्यंजनों की खुशबू और मेले की चहल-पहल मिलकर ददरी को एक ऐसे उत्सव में बदल देती है, जहां हर उम्र के लोगों के लिए कुछ न कुछ खास होता है।

महर्षि भृगु की परंपरा से जुड़ा है ददरी मेला
ददरी मेले को स्थानीय मान्यता के अनुसार महर्षि भृगु की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि यह मेला व्यापार और मनोरंजन के साथ धार्मिक आस्था तथा सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक माना जाता है। अब सबकी निगाहें कार्तिक पूर्णिमा पर टिकी हैं, जब बलिया का यह ऐतिहासिक मेला पूरी रफ्तार से आबाद होगा। उम्मीद है कि इस बार पशु मेले की वापसी और आकर्षक आयोजनों के साथ ददरी अपनी पुरानी पहचान को नए अंदाज में पेश करेगा। 

बलिया के लिए यह सिर्फ मेला नहीं, बल्कि परंपरा, कारोबार और खुशियों का ऐसा संगम है, जिसका इंतजार लोगों को हर साल रहता है। नगर मजिस्ट्रेट/अधिशासी अधिकारी आसाराम वर्मा, चेयरमैन प्रतिनिधि संजय पांडेय, अनिल कुमार, सुधांशु अन्य सभासद गण मौजूद रहें।
रिपोर्ट: असगर अली

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