तकनीकी के माध्यम से हिन्दी का वैश्विक विस्तार संभव: डॉ. प्रमोद शंकर पाण्डेय

 “हिन्दी के वैश्विकीकरण में तकनीकी की भूमिका” विषयक व्याख्यान का हुआ आयोजन
बाँसडीह (बलिया)। स्नातकोत्तर महाविद्यालय बाँसडीह, बलिया में हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत “हिन्दी के वैश्विकीकरण में तकनीकी की भूमिका” विषयक व्याख्यान का आयोजन हिन्दी विभाग द्वारा किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य वर्तमान डिजिटल युग में हिन्दी के बढ़ते प्रभाव, तकनीकी माध्यमों के उपयोग तथा वैश्विक स्तर पर हिन्दी की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करना रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। उपस्थित अतिथि वक्ता डॉ० प्रमोद शंकर पाण्डेय जी का महाविद्यालय परिवार की ओर से पुष्पगुच्छ प्रदान कर स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। तदुपरान्त बीएलएड की छात्रा निक्की तिवारी ने सरस्वती वंदना व स्वागत गीत अंजली और शिवांगी ने प्रस्तुत किया। स्वागत वक्तव्य श्री सत्येंद्र कुमार पाण्डेय व विषय प्रवर्तन अंजनी कुमार मिश्र ने किया। 

विषय पर व्याख्यान देते हुए डॉ० प्रमोद शंकर पाण्डेय जी ने अपने वक्तव्य में हिन्दी भाषा के प्रथम कवि सरहपा का उल्लेख कर, इसके इतिहास, भौगोलिक विस्तार एवं साहित्यिक विकास पर प्रकाश डालते हुये हिन्दी के वैश्विकीकरण पर विस्तार से चर्चा की, जिसमें आपने गिरमिटिया मजदूरो के द्वारा विदेश में श्रीरामचरित मानस पाठ के माध्यम से अपनी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण का उल्लेख किया। डॉ० पाण्डेय ने आगे कहा कि हिन्दी, महज एक भाषा ही नहीं है, बल्कि हिन्द देश के निवासियों को हिन्दी कहा जाता है; इसके समर्थन में डॉ० मु० एकबाल का एक मशहूर तराना- 
“हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा” 
का उल्लेख किया। विदेश के राष्ट्रनायको द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से अपना उद्बोधन अपने देश की भाषा में दिये जाने का उल्लेख करते हुये आपने पहली बार भारतीय राष्ट्रनायक पूर्व प्रधानमंत्री स्व० अटल बिहारी वाजपेयी जी के द्वारा ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की महासभा के मंच से हिन्दी भाषा मे दिये गए उद्बोधन का उल्लेखकर राष्ट्रनायकों के माध्यम से भाषा के वैश्विकीकरण को रेखांकित किया। 

डॉ पाण्डेय ने कहा कि तकनीकी ने हिन्दी के प्रसार की भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल समाचार माध्यम, ब्लॉग, पॉडकास्ट, ऑनलाइन शिक्षा, यूट्यूब तथा अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म हिन्दी को वैश्विक पाठक और श्रोता उपलब्ध करा रहे हैं। यूनिकोड, मशीन अनुवाद, वाक्-से-पाठ तकनीक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी तकनीकों ने हिन्दी के प्रयोग की संभावनाओं को और व्यापक किया है। हिन्दी को वैश्विक स्तर पर सशक्त बनाने के लिए तकनीकी विकास के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण हिन्दी सामग्री का निर्माण, मानक भाषा का संरक्षण तथा नई पीढ़ी को हिन्दी की डिजिटल संभावनाओं से जोड़ना आवश्यक है।

कार्यक्रम में वक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिन्दी के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, किंतु इसके साथ भाषा की शुद्धता, मौलिकता, विश्वसनीयता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता बनाए रखना भी आवश्यक है। इस अवसर पर महाविद्यालय के, उपप्राचार्य डॉ. शिल्पी श्रीवास्तव, डॉ०हंसराज यादव सहित समस्त प्राध्यापक/प्राध्यापिकाएँ, लिपिक एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान हिन्दी के वैश्वीकरण एवं तकनीकी के बदलते स्वरूप पर विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच सार्थक संवाद भी हुआ।

कार्यक्रम के अंत में अतिथि वक्ता को महाविद्यालय परिवार की ओर से पुस्तक एवं सप्रेम पुष्प पौध भेंट कर सम्मानित किया गया। प्राचार्य डॉ. फिरोज खान के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। संचालन श्रीमती कनीज फातिमा ने किया।

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