मेरी पर्यटन यात्रा: बटेश्वर मंदिर समूह

अपने प्राचीन गौरवशाली इतिहास एवं स्थापत्य कला से करा रहा परिचित: डाॅ. गणेश पाठक

कभी -कभी अचानक किसी पूर्व योजना के बिना ही जब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों के भ्रमण करने का सुअवसर प्राप्त हो जाता है तो अत्यन्त खुशी होती है। ऐसा ही एक अवसर मिला जब 24 अगस्त, 2023 को अपने बड़े साले के यहां ग्वालियर पहुंचा तो 25 अगस्त को उन्होंने बटेश्वर मंदिर एवं एकतेश्वर महादेव एवं चौसठ योगिनी मंदिर सहित मुरैना जिला के अन्य महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों के भ्रमण की योजना बना डाला। यहां मैं एक -एक दिन क्रमश: इन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों से अवगत कराने का प्रयास करूंगा।

बटेश्वर मंदिर समूह :-
 मुरैना एवं ग्वालियर से लगभग 35 किमी० दूर पड़ावली नामक गांव के निकट एक कम ऊंचाई वाली पहाड़ी पर 6 वीं से 10 वीं सदी के मध्य मंदिरों का एक ऐसा समूह है, जो पूरी तरह से ध्वस्त होकर अब खण्डहर के रूप में विद्यमान है। कुछ मंदिर बचे हैं, किंतु वो भी क्षतिग्रस्त हैं। यह मंदिर समूह भगवान शिव एवं भगवान विष्णु से संबंधित बताया जाता है एवं यहां जो विग्रह प्राप्त हुए हैं, वो इन्हीं देवताओं से संबंधित हैं। किंतु यहां हनुमान की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। ऐसा भी माना जाता है कि यह मंदिर भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी से संबंधित है। 

इतिहासकारों के अनुसार 6वीं से 10वीं सदी के दौरान इस क्षेत्र में गुर्जर एवं प्रतिहार वंश का शासन था। प्रतिहार वंश के लोग अपने को सूर्यवंशी मानते हैं और अपने को लक्ष्मण का बंशज मानते हैं। यही कारण है कि इस मंदिर समूह को लक्ष्मण से जोड़कर देखा जाता है।

     ऐसा माना जाता है कि बटेश्वर म़दिर समूह के परिसर में लगभग 200 मंदिर रहे होंगे, जो 25 एकड़ में फैला है। इन  मदिरों के ध्वस्त होने एवं खण्डहर के रूप में परिवर्तित हो जाने का कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता। यह मंदिर समूह कब और कैसे ध्वस्त हुआ ,इसका भी कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है। ऐसा माना जाता है कि 13 वीं सदी के बाद यह मंदिर समूह विदेशी आतताईयों अथवा भूकम्प के तेज झटकों द्वारा ध्वस्त होकर खण्डहर के रूप में बदल गया होगा। ध्वस्त हुए मंदिर के पत्थर खण्डहर के रूप में एवं विखण्डित मूर्तियां यत्र - तत्र बिखरी हुई हैं। जो मंदिर अवशेष के रूप में बचे हुए हैं, वो भी पूर्णरूपेण सही नहीं हैं। 

जो भी हो इस मंदिर समूह का खण्डहर आज भी अपने प्राचीन गौरवशाली इतिहास एवं स्थापत्य कला के गौरव को बताने के लिए पर्याप्त है तथा बलुआ पत्थर से निर्मित 'उत्तर भारतीय नागर वास्तकला' एवं 'गुर्जर - प्रतिहार शैली' का उत्तम नमूना प्रस्तुत करता है, जिसको देखने एवं अध्ययन करने हेतु देशी एवं विदेशी पर्यटक, शोधछात्र, इतिहासकार तथा धार्मिक - आध्यात्मिक प्रवृत्ति के दर्शनार्थी भी इस मंदिर समूह को देखने के लिए आते रहते हैं।

  सन 2005 में देश के प्रसिद्ध पुरातत्वविद के के मोहम्मद ने स्थानीय निवासियों को लेकर कई वर्षों से इस मंदिर समूह को सहेजने, पत्थरों को आपस में जोड़कर व्यवस्थित रूप प्रदान कर यथास्थान पुनर्स्थापित कर मूर्तरूप प्रदान करने का भरपूर प्रयाह किया है, जिसका सार्थक परिणाम सामने आया है और अनेक मंदिर तथा मूर्तियां व्यवस्थित स्वरूप प्रदान कर पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। अब भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग भी इस कार्य में सहयोग प्रदान कर रहा है।

 उम्मीद है कि यदि इस मंदिर समूह का उद्धार कर इसका पुनर्निर्माण कर सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया जाय तो यह बटेश्वर मंदिर समूह न केवल दर्शनीय रूप में, बल्कि पर्यटन के रूप में इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।

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