प्रगतिशील चेतना का सामाजिक दस्तावेज है मुंशी प्रेमचंद का साहित्य: प्रो.सन्तोष प्रसाद गुप्त

कबीरम् समाज एवं अन्य संगठनों के तत्वावधान में मनाई गई मुंशी प्रेमचन्द की जयंती
बलिया। कबीरम् समाज बलिया, अखिल भारतीय विश्वविद्यालय सम्बद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ (ए0आई0एफ0यु0सी0टी0ओ0) तथा जनवादी लेखक संघ-बलिया जैसे विभिन्न संगठनों तथा विभागों के तरफ से 31 जुलाई दिन शुक्रवार को हिन्दी तथा उर्दू के लोकप्रिय उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द की जयंती धूमधाम से मनायी गयी। 

सर्वप्रथम कबीरम् समाज, बलिया तथा अखिल भारतीय विश्वविद्यालय, सम्बद्ध महाविद्यालय शिक्षक संघ (ए0आई0एफ0यु0सी0टी0ओ0)  के आजीवन सदस्य व संरक्षक तथा टी0डी0 काॅलेज अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो0 सन्तोष प्रसाद गुप्त ने श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया के प्राचार्य डाॅ0 दयालानन्द राय जी को मुंशी प्रेमचंद की कलाचित्र देकर सम्मानित किया गया तथा सभी के मंगलमय की कामना की गयी। उक्त अवसर पर प्रो0 रामनरेश यादव, प्रो0 अनुराग भटनागर, डाॅ0 ददन सिंह, प्रो0 सन्तोष प्रसाद गुप्त इत्यादि मौजूद रहे।

आगे कबीरम् समाज बलिया के तत्वावधान में एन0सी0सी0 तिराहे के पास हरपुर मुहल्ले में मुंशी प्रेमचंद की जयंती मनायी गयी। उक्त अवसर पर प्रो0 सन्तोष प्रसाद गुप्त ने कहा कि ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में हुआ था जिनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था जिन्हे नवाब राय भी कहा जाता था।इनकी माता का नाम आनन्दी देवी और पिता का नाम अजायबलाल था। इन्होंने गोदान, गबन, सेवा सदन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि, माधुरी, ईदगाह, पूस की रात इत्यादि उपन्यासांे/कहानियों/पत्रिकाओं इत्यादि की रचना की। जिनका साहित्य सन् 1906 से 1936 के बीच लिखा गया साहित्य, प्रगतिशील चेतना का सामाजिक व सांस्कृति दस्तावेज है जो आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान युवा पीढ़ी को उनसे सीख लेना चाहिए। समाजवादी विचारक श्री यशपाल सिंह ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में उस दौर की समाज सुधार आन्दोलनों तथा स्वाधीनता आन्दोलनों के प्रभावों का स्पष्ट चित्रण है, जिसमें दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छुआछूत, भेद-भाव, विधवा विवाह, आधुनिकता इत्यादि प्रमुख विषय रहे हैं। 

उक्त अवसर पर शासन प्रशासन के विविध प्रपत्रों जैसे महात्मा गांधी के बचपन का नाम ‘‘मोनिया’’ के संदेश पत्र को पढ़कर सुनाया गया। जैसे-19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान किया जाय। अर्थात सार्वजनिक तथा ऐकेडमिक अवकाश घोषित किया जाय। पुरानी पेंशन योजना पुनः बहाल किया जाय अर्थात केन्द्र व राज्य सरकारों में सन् 2004-05 के बाद नियुक्त कार्मिकों जैसे कर्मचारी, शिक्षक, अधिकारीगणों इत्यादि को पुरानी पेंशन योजना पुनः बहाल किया जाय। नई पेंशन योजना रद्द किया जाय। यू0पी0एस0 बन्द किया जाय। तदर्थ तथा संविदा के आधार पर कार्य कर रहे कार्मिकों की सेवाओं का स्थायीकरण एवं विनियमितीकरण किया जाय। शोधकर्ताओं को शोध अध्येत्तावृत्ति रू0-25000/-(पच्चीस हजार रू0) प्रतिमाह प्रदान किया जाय। विकास भत्ता प्रति परिवार प्रति सदस्य के हिसाब से रू0-2500/-(दो हजार पांच सौ रू0) प्रतिमाह प्रदान किया जाय। आधार कार्ड की अनिवार्यता समाप्त किया जाय। लाॅकडाउन से पीड़ित परिवार की मदद की जाय। आपदा प्रबन्धन नीति को मजबूत की जाय। न्याय की पहुंच को आम आदमी तक सरल व सुगम की जाय। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सर्वसुलभ, सरल तथा मजबुत किया जाय। बलिया के प्रथम सांसद, कुशल अधिवक्ता एवं स्वतंत्रता सेनानी मुरली मनोहर के नाम पर श्री मुरली मनोहर केन्द्रीय विश्वविद्यालय की सुविधा प्रदान किया जाय। हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाय। सार्वजनिक क्षेत्र में फीस/फेयर/फाइन जैसी निजी संकल्पना बंद की जाय। सम्पूर्ण भारतवर्ष में रामराज्य लागू की जाय, इत्यादि।

 ‘‘इसी क्रम में उक्त अवसर पर जनपद बलिया के कृपालपुर सोनवानी निवासी समाज सेवी श्री घूराराम ने बताया कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय, नई दिल्ली के अधिकारीगण उनके मो0नं0-7275910783 पर उपरोक्त सभी डिमाण्ड को पूर्ण किये जाने को लेकर कई बार बात कर चुके हैं। व चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी उनके मो0नं0-7275910783 पर बात करें व मुलाकात करंे तथा संतुष्ट करें जिससे वे आश्वस्त हो सके। आशा की गयी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा जल्द ही सभी डिमाण्ड के पूर्ण किये जाने की घोषणा की जा सकती है। उक्त अवसर पर सिपाही राम, बब्बन यादव, प्रो0 सन्तोष प्रसाद गुप्त, राजकुमार जी, सुरेन्द्र जी, सन्तोष जी, विनय पाण्डेय, नित्या बचन राम, आकाश शर्मा, अधिवक्ता श्रीराम जी ठाकुर, अजय कुमार गुप्ता, डाॅ0 फतेह चन्द बेचैन, जाकिर हुसैन,  इत्यादि रहे। 

आगे इसी क्रम में जनवादी लेखक संघ बलिया द्वारा श्री मुरली मनोहर टाउन पी0जी0 काॅलेज, बलिया के राजेन्द्र प्रसाद सभागार में आयोजित विचार गोष्ठी में सहभागिता की गयी जिसका प्रमुख विषय ‘‘कल तथा आज’’ रहा। हिन्दी विभाग के प्रो0 जैनेन्द्र कुमार पाण्डेय ने बीच व्याख्यान रखते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद का बचपन आर्थिक अभाव में बीता था। कम उम्र में ही उनके माता-पिता का साया उठ जाने के कारण बहुत ही संघर्ष में बीता। जिनकी शिक्षा बी0ए0 तक ही हुई। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की परन्तु देश प्रेम व गांधीजी के असहयोग आन्दोलनो में सहभागिता कर साहित्य सृजन करते रहे जो सभी के लिए आज भी प्रेरणादायी है। वीर कुँवर सिंह महाविद्यालय बलिया के हिन्दी विभाग के प्रो0 मंजीत कुमार सिंह ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में भाव व विचारों में संतुलन है वे धनिया, ओमकार नाथ, होरी, गोबर जैसे पात्रों के माध्यम से खुद खड़े हो जाते हैं जिसके केेन्द्र में मुनष्य की रचना की गयी हैै। उन्होने कहा कि मूलतः प्रेमचंद का साहित्य माक्र्सवादी नही अपितु गांधीवादी रहा है।

 इसी कड़ी में जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय सम्बद्ध सहायता प्राप्त महाविद्यालय शिक्षक संघ, बलिया के अध्यक्ष प्रो0 अखिलेश कुमार राय ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य परिवर्तन के लिए संघर्ष की चेतना के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी क्रम में टी0डी0 काॅलेज, हिन्दी विभागध्यक्ष प्रो0 बृजेश कुमार सिंह त्यागी ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी दुनिया में सबसे अधिक पढ़ा जा रहा हैं। अध्यक्षता करते हुए प्रो0 दयालानन्द राय ने कहा कि प्रेमचन्द का साहित्य आज भी जीवन्त है जो सभी को सीख व प्रेरणा प्रदान करता है। 

उक्त कार्यक्रमों में प्रमुख रूप से कामरेड परमात्मानन्द राय, कामरेड अशोक कुमार पाण्डेय, विनय पाण्डेय, जनवादी लेखक संघ के संयोजक अधिवक्ता अजय कुमार पाण्डेय, ए0आई0एफ0यू0सी0टी0ओ0 के जोनल सचिव डाॅ0 भारतेन्दु कुमार मिश्रा, राजर्षि टण्डन विश्वविद्यालय, प्रयागराज के समन्वयक प्रो0 संजय कुमार  सरोज, डाॅ0 उमेश कुमार गुप्ता, शिक्षण संकाय अध्यक्ष डाॅ0 ओमकार सिंह, डाॅ0 मंगल चन्द राय, डाॅ0 अनिल कुमार इत्यादि उपस्थित रहे। अंत में प्रो0 सन्तोष प्रसाद गुप्त ने सभी के प्रति आभार व्यक्त की।

Comments

Popular posts from this blog

खेल दिवस पर राजकीय महाविद्यालय नगवा में कबड्डी प्रतियोगिता का हुआ आयोजन

महिला सशक्तिकरण के बिना संभव नहीं हैं समग्र सामाजिक विकास: डॉ. पुष्पा मिश्रा

ओजोन परत संरक्षण दिवस, 16 सितम्बर पर विशेष-