25 जुलाई को आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की 132वीं जयंती पर विशेष-
आध्यात्मिक, मानवतावादी एवं कालजयी साहित्यकार रहे आचार्य परशुराम चतुर्वेदी
प्रस्तुति: डाॅ० गणेश कुमार पाठक
बलिया की माटी के लाल एवं महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की बगिया के सपूत आचार्य परशुराम चतुर्वेदी एक ऐसे लोक, आध्यात्मिक एवं मानवतावादी साहित्यकार रहे, जिनकी रचनाएं कालजयी हैं। आचार्य चतुर्वेदी जी द्वारा दक्षिणामूर्ति के मौन, गुरू नानक के प्यार एवं संत तुलसी के समन्वय को अकादमिक शास्त्र का स्वरूप प्रदान किया गया। किंतु आचार्य जी के ऊपर सबसे गहरा प्रभाव कबीर एवं गुरू नानक का ही है, जिसकी स्पष्ट झलक इनकी रचनाओं से मिल जाता है।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी के ऐतिहासिक कार्य-
अपनी रचनाओं के माध्यम से आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी द्वारा तीन ऐतिहासिक कार्य किए गए -
1.संग्रह - आचार्य चतुर्वेदी जी ने संतों के बिखरे हुए संदेशों को बीज बैंक की तरह एक स्थान पर एकत्रित करने का कार्य किया, जिससे कि वो नष्ट न हों।
2.विश्लेषण -आचार्य चतुर्वेदी ने बताया कि कबीर क्रांतिकारी क्यों थे, नानक लोकप्रिय क्यों थे और सूर - तुलसी कालजयी क्यों थे। इन सबको उनके द्वारा संचार की भाषा में समझाया गया।
3.सेतु -आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने स़स्कृत के शास्त्र एवं गांव के संत के मध्य पुल बनाने का काम किया और काशी हिन्दू विश्विद्यालय में बैठकर लोक की बात की।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार संत की पहचान-
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी का कहना था कि यदि संत को तुम धार्मिक व्यक्ति एवं उनकी वेष - भूषा से समझने का प्रयास करोगे तो धोखा खा जाओगे। संत को ज्ञान एवं आचरण से पहचानना होगा। संत अपने युग का सबसे बड़ा पत्रकार होता हो।
पत्रकारों के संदर्भ में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का विचार-
पत्रकारों के संबंध में आचार्य जी का कहना है कि पत्रकार को दक्षिणामूर्ति की तरह कम बोलते हुए प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कहनी चाहिए। इसके लिए सर्व प्रथम मन को शांत कर लेना चाहिए और सत्य की परख कर सत्य ही बोलना चाहिए। पत्रकार को कबीर की तरह लिखना चाहिए, जो ढकोसला पर चोट करे।
पत्रकार को झूठ नही, खरा लिखना चाहिए। जिंदा रहना है तो नानक एवं तुलसी की तरह जीना चाहिए। जोड़ना सिखें, तोड़ना नहीं। सेवा के लिए संवाद करें एवं समन्वय बनाए रखें। ए सी कमरे में बैठकर खबर नहीं बनती है। स्व को बचाते हुए संवाद करना चाहिए। स्व को खोकर जीना मृत्यु समान है।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की रचनाएं-
1. उत्तरी भारत की संत परम्परा
2. संत साहित्य की परख
3. संत साहित्य के प्ररणास्रोत
4. हिन्दी काव्य धारा में प्रेम प्रवाह
5. मध्य कालीन प्रेम साधना
6. मध्य कालीन ऋंगारिक प्रवृत्तियां
7. बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक
8. दादू दयाल ग्रंथावली
9. मीरा बाई की पदावली
10. संक्षिप्त रामचरित मानस
11. कबीर साहित्य की परख
उपर्युक्त रचनाओं के माध्यम से आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जनता से सीधे संवाद स्थापित किया। उनका जन संवाद राजनैतिक न होकर आध्यात्मिक एवं मानवतावादी है , जो युगों - युगों तक कायम रहेगा।
( नोट - डाॅ० जय प्रकाश तिवारी के ह्वाट्सएप वाल से संक्षिप्त कर प्रस्तुत)
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