मेरी पर्यटन यात्रा:-

शिव का रहस्यमय मंदिर - ककनमाठ, भूत-प्रेतों ने बनाया था जिसे
                                             डाॅ. गणेश पाठक
      ग्वालियर प्रवास के दौरान यहां से 55 किमी० की दूरी पर मध्य -प्रदेश के मुरैना जिला के सिहोनिया नामक गांव में स्थित 'ककनमाठ' मंदिर एक ऐसा अनोखा एवं रहस्यमय शिव मंदिर है, जिसका निर्माण किसी गारा, सिमेंट या चूना के बिना केवल पत्थरों को एक दूसरे के ऊपर रख कर बनाया गया है, एक हजार बर्ष से अधिक समय का हो जाने के बाद भी टिका हुआ है।

     किंबदन्तियों के अनुसार इस शिव मंदिर का निर्माण भूत - प्रतों द्वारा एक रात में ही कराया गया। किंतु यह मंदिर अधूरा रह गया। कारण कि भूत - प्रेत दिन के उजाले में नहीं दिखाई देते हैं और न ही अपनी कोई हरकत करते हैं। इसलिए भोर होते ही भूत - प्रेत वहां से चले गए और मंदिर अधूरा रह गया। इस मंदिर के संदर्भ में यह भी कहा जाता है जिस दौरान इस मंदिर का निर्माण हुआ, उस दौरान इस तरह के मंदिर का निर्माण करना मनुष्य के बस की बात नहीं थी। इसी लिए यह मंदिर अभी भी रहस्यमय बना हुआ है।

     इस संदर्भ में यह भी किंबदंती सुनने को मिलती है की इस मंदिरके निर्माण के लिए स्वयं भगवान शिव ही अपने गणों ( भूत - प्रेत ) से एक रात में ही मंदिर बनाने के लिए कहे थे। यही कारण है कि इस मंदिर कि निर्माण अधूरा होने पर भी इस शिव मंदिर के प्रति इस क्षेत्र के लोगों का अटूट विश्वास एवं आस्था है तथा शिवरात्रि के दिन यहां पर विशाल मेला लगता हैं एवं इस क्षेत्र के लोग शिव की पूजा करते हैं। 

   ऐसी भी किंबदंती सुनने को मिलती है कि इस मंदिर के प्रांगण में कोई रात में नहीं रूकता है तथा रात में इस मंदिर प्रांगण में विचित्र तरह की आवाजें सुनाई पड़ती हैं।

    वहीं दूसरी तरफ इतिहासकारों का कहना है कि इस रहस्यमयी एवं ऐतिहासिक शिव मंदिर का निर्माण 11 वीं सदी,(1915 - 1935 ई०)  में कच्छपपात राजवंश के राजा कर्णराज अथवा कीर्तिराज द्वारा अफनी रानी 'ककनावती' की याद में बनाया गया था। इसी लिए इस मंदिर का नाम ककन मठ पड़ा। इस शिव मंदिर की ऊंचाई लगभग 115 फीट है और इसका मुख्य ढांचा एक ऊंचे चबुतरे पर बना हुआ है। मुख्य मंदिर के अलाला इस मंदिर प्रांगण में अनेक छोटे  - छोटे मंदिर बने हुए थे, जो कालान्तर में आक्रांताओं द्वारा अथवा भूकम्प के झटकों से गिर गए , जिनके अवशेष आज भी दिखाई देते हैं। मंदिर के मुख्य गेट के पास भी एक ऊंचे चबुतरे पर एक छोटे से मंदिर में शिवलिंग स्थापित है, जिसकी आज भी पूजा की जाती है।

     यदि स्थापत्य कला की दृष्टि से देखा जाय तो इस  मंदिर का निर्माण गुर्जर - प्रतिहार शैली में हुआ है, जिसके ऊंचे शिखर, नक्कसीदार स्तंभ एवं भव्य संरचना आज भी विद्यमान है। इस मंदिर को देखने में तो ऐसा लगता है कि अभी - अभी भर- भरा कर गिर जायेगा, किंतु निश्चित तौर पर इस मंदिर का निर्माण गुरूत्वाकर्षण संतुलन के आधार पर बनाया गया है, जो अद्भूत शिल्पकला का उदाहरण है और हजारों बर्षों से आंधी - तूफान के थपेड़ों एवं भूकम्प के झटकों झलते हुए भी इस मंदिर के पत्थर एक पर एक बिना गारा, सिमेंट या चूना लगाए टिके हुए हैं एवं अपनी भव्यता तथा रहस्य को बरखरार रखे हुए हैं। ऐसा भी सुनने को मिलता है कि आक्रांताओं द्वारा भी इस मंदिर को गिराने का प्रयास किया गया , किंतु वो अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाए। यही कारण है कि अभी भी इस क्षेत्र के लोगों में इस शिव मंदिर में एवं भोले नाथ में अटूट आस्था एवं विश्वास बना हुआ है।

   ग्वालियर के सास- बहू मंदिर में रखे एक शिलालेख से इस बात की पुष्टि होती है कि राजा कीर्ति राज ने सिहोनिया ( सिंहपानीय) में इस मंदिर का निर्माण अपनी रानी ककनावती के नाम पर 'ककनमठ' (ककन अर्थात् रानी  एवं मठ अर्थात् शिव मंदिर ) मंदिर रखा गया।

    कुछ भी यह शिव मंदिर आज भी अनेक रहस्यों को अपने अन्दर समेटे हुए है, जिसका शोध आवश्यक है। किंतु इस मंदिर के संदर्भ में चर्चित किंबदंतियों के कारण ही संभवत: कोई रहस्यों को जानने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। वर्तमान समय में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देख - रेख में है, ताकि इस ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहर को सुरक्षित एवं संरक्षित रखा जा सके।

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