15 अगस्त 1942 को बलिया मे क्या हुआ था

* रेवती मे बनी स्वराज सरकार। 
* सहतवार, नरही थाना पर फहराया गया तिरंगा। 
*  ओक्डेनगंज और जापलिंनगंज पुलिस चौकी छोड़कर भाग गए सिपाही दरोगा। 
बलिया। सन 1942 में बलिया जिले की जनता ने उसी स्वाधीनता को जमीन उतारने का संकल्प कर लिया था।
इतिहासकार डाॅ.शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि 15 अगस्त तक रेवती रेलवे स्टेशन से पूरव बकुलहा तक रेल पटरियों को उखाड़ दिया गया था। सड़कों पर जगह-जगह खाइयों खोदकर, पेड़ काटकर सड़कों को बंद कर दिया गया।

 आज सेनानी श्रीपति कुँवर के नेतृत्व मे सहतवार थाना और रेवती पुलिस चौकी के सिपाहियों को डरा-धमका कर भगा दिया गया, इनके भवनों पर स्वराज सरकार का तिरंगा फहराने लगा, सुरक्षा की जिम्मेदारी जनता के द्वारा जनता के हाथों में आ गयी। डाकघर, कानूनगो कार्यालय, टाऊन एरिया ऑफिस सभी पर स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। इन पर तैनात ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों कर्मचारियों को खदेड़ दिया गया था।

              डाॅ.शिवकुमार सिंह कौशिकेय
                           इतिहासकार

       डाॅ.कौशिकेय ने कहा कि अब यहाँ पर वास्तविक अर्थों में स्वराज की सरकार ने सुराज, महात्मा गांधी जी के रामराज्य की लोकतांत्रिक प्रथम पंचायती राज शासन की व्यवस्था चलाई जाने लगी। जनता के द्वारा जनता के लिए बनीं स्वराज की सरकार के स्वयंसेवकों ने मात्र चौबीस घंटे में सुरक्षा सहित संपूर्ण व्यवस्था को संभाल कर सुराज स्थापित कर लिया। बाजारों में सही नाप-तौल के साथ उचित मूल्य पर सभी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होने लगी। सभी प्रकार के अपराधों पर संपूर्ण नियंत्रण कर लिया गया। चोरी, डकैती, छिनैती, लूट, हत्या, बलवा-फिरौती जैसे बड़े अपराधों की बात तो छोड़ दीजिए, सामान्य झगड़े, तकरार, बेगार, गाली गलौंज तक की कोई भी घटना इस दस दिनों की सुराज सरकार के शासनकाल में घटित नहीं हुई। 

लोग कामगारों-मजदूरों से भी सम्मान के साथ व्यवहार करने लगे, उनकों उचित मजदूरी देने लगे। बाजारों में नशे की वस्तुओं गाँजा, भांग, शराब की बिक्री बंद हो गयी, लोग पैसे देकर सामान खरीदते थे, कहीं पर भी किसी के साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं हो रही थी। सभी को लग रहा था कि यह हमारी अपनी व्यवस्था है, जिसके अनुशासन का पालन हमें स्वयं करना है।

लोकतंत्र की इस पहली सुराज सरकार ने पूरे देश के लिए स्वराज और पंचायती राज व्यवस्था का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। जिसकी जानकारी मिलने पर प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि "बलिया जिले के अपराधियों का भी शायद हृदय परिवर्तन हो गया था, इसलिये वहाँ पर सुराज की सरकार का सपना सफलता पूर्वक साकार हो गया था।"

 भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह के नेतृत्व मे बैरिया थाने पर  जुटी हजारों की भीड़ के सामने ब्रिटिश सरकार के थाना अध्यक्ष काजिम हुसैन ने आत्मसमर्पण कर दिया था। आंदोलनकारियों ने वहां तिरंगा फहराया और थाने को खाली करने को कह दिया।

नरही थाना पर स्वामी ओंकारानंद जी और अन्य नेताओं के नेतृत्व में विशाल भीड़ ने नरही थाने को घेरा। वहां तैनात ब्रिटिश थानेदार कुंवर सुन्दर सिंह को तिरंगे को सलामी देनी पड़ी और उन्होंने आंदोलनकारियों को नजराना भेंट किया।

बलिया शहर मे 15 अगस्त को विशाल जुलूस निकाला गया। आंदोलनकारी युवाओं ने ओक्डेनगंज और जापलिनगंज पुलिस चौकियों को खाली करवाकर रेलवे स्टेशन, गोदामों और माल गोदामों में आग लगा दी।

बलिया जिले में स्थानीय 'स्वराज सरकार' की स्थापना के लिए आम जनता ने गांधीवादी अहिंसात्मक निर्देशों के बजाय सक्रिय और आक्रामक प्रतिरोध का रास्ता चुना था।
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संदर्भ ग्रंथ: 1942 की अगस्त क्रांति और बलिया । 
 प्रकाशक क्षेत्रीय अभिलेखागार वाराणसी। 
लेखक: डाॅ.शिवकुमार सिंह कौशिकेय 

उत्तरप्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम: बलिया। 
प्रकाशक संस्कृति विभाग उत्तरप्रदेश। 
लेखक: डाॅ.शिवकुमार सिंह कौशिकेय।

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