अब यों ही बदलता रहेगा मौसम का मिजाज: डाॅ० गणेश पाठक

आखिर मौसम में बार- बार क्यों है रहा है अचानक परिवर्तन 
आज सुबह -सुबह बलिया का खतरनाक मौसम। रात से ही आंधी, बादलों की गरज -तड़प एवं बर्षा से मौसम हुआ चिंतनीय। तापमान में गिरावट। गर्म मौसम हुआ नम। जलवायु परिवर्तन एवं पश्चिमी विक्षोभ की बार -बार पुनरावृत्ति से बेमौसम आंधी एवं बर्षा की आफत। फसलों के नष्ट होने के डर से किसानों की चिंता बढ़ी। मौसम की अनियमितता से स्वास्थ्य भी होगा प्रभावित। गर्म एवं नम मौसम के संक्रमण से शरीर में भी बढ़ सकता है स्वास्थ्य संबंधी संक्रमण।

अब यों ही बदलता रहेगा मौसम का मिजाज 
  अजीब संयोग है, 23 मार्च को विश्व के अधिकांश देशों में 'मौसम विज्ञान दिवस' मनाने की तैयारी चल रही की जा रही थी कि उससे तीन दिन पहले से ही मौसम ने उत्तर भारत में अचानक ऐसा करवट बदला कि न केवल किसानों के माने पर बल पड़ गये, बल्कि भी मौसम वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ गयी। 10 मार्च के बाद गर्मी अपना रूप दिखाने लगी थी कि तभी 19 मार्च से 21 मार्च तक पश्चिमी विक्षोभ के चलते आंधी सहित तेज बारिश एवं ओलों के गिरने से खासतौर से किसान चिंतित हो गये, क्यों उनकी फसलों पर संकट के बादल मंडराने लगे। उसके बाद पुनः 26 मार्च से मौसम में बदलाव शुरू हो गया और  27 मार्च की रात को मौसम ने पुनः करवट ले लिया और तेज हवा के साथ तेज बर्षा भी हो गयी। जो फसलों के लिए  काफी नुकसानदेह साबित  हुई है।     
आखिर मौसम में  बार- बार यह अचानक परिवर्तन क्यों है रहा है। क्या यह सिर्फ पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव है या यह जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया है। इन्हीं तथ्यों पर कुछ जानने का विचार किया गया है। वास्तव में वर्तमान समय में मानवीय गतिविधियों, नगरीकरण एवं औद्योगीकरण तथा तीव्र गति से हो रहे वन विनाश के चलते ग्लोबल वार्मिंग में भी तेजी से वृद्धि हो रही है , जिससे जलवायु परिवर्तन में भी तेजी आ रही है और उसका दुष्प्रभाव मौसम तथा जलवायु पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगा है।

 ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के कारण कभी भयंकर गर्मी तो कभी भयंकर शीत लहर, कभी अनावृष्टि के कारण सूखा तो कभी अति वृष्टि के कारण बाढ़ , कभी मौसम में सबको चकित कर देने वाला अचानक परिवर्तन, तो कभी वायुमंडलीय विक्षोभ, कभी ओला गिरना तो कभी घना कोहरा आदि घटनाओं ने मानव एवं मौसम वैज्ञानिकों को सोचने के लिए बाध्य कर दिया है। ये सभी घटनाएं अपने तीव्रतम रूप में शुरू हो गयी  और वर्तमान समय में तो इनकी तीव्रता का प्रभाव सहन सीमा को पार कर गया है। यह सब देखते हुए तो यही कहना पड़ रहा है कि 'अब यों ही बदलता रहेगा मौसम का मिजाज'।

   वास्तव में मौसम में हो रहा यह परिवर्तन पश्चिमी विभिन्न की ही देन है, किंतु इस वर्ष पश्चिमी विक्षोभ बार - बार क्यों आ रहा है,यह शोचनीय बात है। इस पश्चिमी विक्षोभ के पुनरावृत्ति में जेट स्ट्रीम का भी प्रभाव है  तथा भूमध्यसागर को पार कर आने वाली नम हवाओं का भी प्रभाव है ,जो दबाव के कारण नीचे की तरफ खिसकर उत्तर भारत तक अपना प्रभाव दिखा रहा है। पहाड़ों पर हुई बर्फ बारी भी इसमें अहम् भूमिका निभा रही हैं। अभी इस पश्चिमी विक्षोभ की और पुनरावृत्ति हो सकती है।
                       डॉ. गणेश कुमार पाठक 
                               पर्यावरणविद 

 मौसम वायुमंडल की अल्पकालिक दशाओं की अवस्था को कहा जाता है, जबकि जलवायु एक लम्बी अवधि की औसत प्रवृत्ति को कहा जाता है। वर्तमान समय में मौसम एवं जलवायु दोनों में विशेष परिवर्तन हो रहा है, जो दिन प्रति दिन हानिकारक होता जा रहा है। यदि हमें अस्थिर मौसम एवं जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचना है तो हमें अपनी जीवन की कार्यशैली को बदलना होगा। हमें भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवन शैली अपनानी होगी। हमारी संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है। हमारे यहां प्रकृति के पांच मूलभूत तत्वों - क्षिति, जल, पावक, गगन एवं समीर को भगवान के रूप में पूजा करने की परम्परा रही है। इस परम्परा क हमें पुनः पालन करना होगा। पृथ्वी को हरा - भरा बनाना होगा।
  
 पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक धरती के 33 प्रतिशत भाग को वृक्षों से आच्छादित करना होगा, जिसके लिए मुहिम बनाकर जन - जन को पौधारोपण करना होगा। जल संसाधनों को येन - केन प्रकारेण संरक्षण करना होगा,जंगलों को कटने से बचाना होगा, तभी हम जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बच सकेंगे। अन्यथा 'हम ही शिकारी, हम ही शिकार' वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी और हम अपना विनाश अपने आंखों के सामने हो होते देखते रह जायेंगे और अंततःकुछ नहीं कर पायेंगे।

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