कैसे फटते हैं बादल?: डाॅ. गणेश पाठक

जाने बादल विस्फोट से सुरक्षा का उपाय 
 अल्प अवधि के दौरान एक छोटे से क्षेत्र में अत्यधिक मात्रा में अचानक होने वाली वर्षा को बादलों के फटते की घटना को 'मेघ प्रष्फोट' अथवा 'बादल विस्फोट' अथवा  'बादलों का फटना' कहा जाता है।

 वास्तव में ऐसी विशेष दशा उत्पन्न होती है कि बादल एक जगह पर एकत्रित होकर पूरे वेग से अपने सम्पूर्ण जल को तीव्र वर्षा जल के साथ एक स्थान पर ही बरसने को मजबूर हो जाते हैं। बिना किसी पूर्व चेतावनी अथवा बिना पूर्वाभ्यास के घटित होने वाली तेज एवं भारी वर्षा जब एक स्थान पर है जाती है तो उसे 'बादलों का फटना' कहा जाता है। 

क्यों फटते हैं बादल :-
 वास्तव में बादलों का विस्फोट तभी होता है, जब आर्द्रता से परिपूर्ण वायु में शक्तिशाली संवहनीय धारा उत्पन्न होती है, तब अत्यधिक शक्ति एवं वेग से अल्प अवधि में ही भारी मात्रा में वर्षा हो जाती है। मानसून के मौसम में गर्म एवं ठंडी हवाओं के परस्पर मिलन क्षेत्र में सामान्यतः बादल विस्फोट की घटनाएं हुआ करती हैं।

 बादल विस्फोट की घटना को स्थान विशेष के उच्चावच स्थलाकृति, आर्द्रता प्रतिशत, निलंबी घाटियों में बादलों के जमाव एवं पहाड़ी ढलानों पर पर्वतीय तापमान में प्राप्त अन्तर जैसे महत्वपूर्ण कारक नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में बादल प्रायः दक्षिण से उत्तर की तरफ बढ़ते हैं। जब ये बादल सर्पाकार भू- आकृति से टकराते हैं तो वहां घाटी तीन तरफ से बंद होती है, उस स्थिति में इन बादलों के आगे बढ़ने की गति पर रोक लग जाती है। फलस्वरूप बादल एक के ऊपर एक एकत्र होने लगते हैं। कुछ समय बाद ये बादल अपने अंदर निहित आर्द्रता के भार को और अधिक समय तक रोक पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसी परिस्थिति में ये बादल मूसलाधार रूप में उस सीमित क्षेत्र में अल्प अवधि में ही बरस जाते हैं। 

भारी रूप में हुई यह वर्षा उस क्षेत्र के लिए प्राकृतिक आपदा का रूप ले लेती है। इस स्थिति को ही 'बादलों का फटना' कहा जाता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार बादल विस्फोट हेतु एक घंटे में कन्वेक्टिव  बादलों  से 100 मिमी अथवा उससे अधिक वर्षा का होना आवश्यक होता है। बादल विस्फोट के समय कन्वेक्टिव बादलों की भूतल से ऊंचाई 15 किमी तक होती है। 

वायु के ऊपर उठने की प्रक्रिया दो प्रकार से होती है :-
 पहला पर्वतीय क्षेत्रों में आर्द हवाएं पर्वतीय अवरोध के कारण बलपूर्वक अचानक तीव्र गति से ऊपर उठ जाती हैं, जिससे कि हिमांचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में बादलों का विस्फोट अधिक होता है। दूसरा सूर्यातप के कारण धरातल अत्यधिक गर्म हो जाने के कारण आर्द्र हवाएं गर्म होकर तीव्र गति से ऊपर उठती हैं। आर्द्र हवाओं के अचानक ऊपर उठने से अचानक ही संवहनीय प्रक्रिया शुरू हो जाती है, फलत: बादलों का विस्फोट हो जाता है। इस तरह की प्रक्रिया भारत के मैदानी एवं पठारी दोनों क्षेत्रों में होता है।

बादल  विस्फोट के क्षेत्र एवं प्रभाव :-
  बादल फटने की घटनाएं भारत सहित विश्व के अनेक देशों में होती रहती हैं। विश्व के देशों में खासतौर से पनामा, संयुक्त राज्य अमेरिका, रोमानिया, मारीशस, जमैका, पाकिस्तान एवं बंगलादेश में अधिक होती हैं। इन देशों में बादल फटने की इतनी भयंकर घटनाएं हुई हैं कि वो प्राकृतिक आपदा का रूप लेकर अपार धन -जन की क्षति पहुंचाई हैं।
      
अपने देश में खासतोर से हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तरी भारत एवं पठारी प्रदेश तथा पश्चिमी घाट क्षेत्र में बादल विस्फोट की घटनाएं अधिक होती हैं। खासतोर से हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में होने वाला बादल विस्फोट इतना भयानक भैया है कि उनके प्रभाव से  प्रतिवर्ष आकस्मिक बाढ़, जल प्रलय एवं भू - स्खलन जैसी प्राक्रतिक आपदाएं अपना विकराल रूप धारण कर अपार धन - जन की क्षति करती हैं। 

उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र, खासतौर से उत्तर काशी, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा एवं टिहरी जनपद तो बादल विस्फोट के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। बादल विस्फोट के प्रभाव से न केवल धन - जन की क्षति होती है, बल्कि सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था तहस - नहस हो जाती है, अवस्थापना तत्व ध्वस्त हो जाते हैं, पर्यावरणीय एवं  पारिस्थितिकीय संरचना असंतुलित हो जाती है तथा जैव विविधताओं का ह्रास हो जाता है।
 
बादल फटने की नवीनतम घटनाओं में 2013 में केदारनाथ (उत्तराखंड) में हुए बादलों के विस्फोट से आए सैलाब में 5000 से अधिक लोग मरे, हजारों लापता हो गये और इस क्षेत्र का भूगोल ही बदल गया। यह एक अति हृदय विदारक घटना थी। 2022 में जम्मू -कश्मीर में अमरनाथ गुफा के निकट हुए बादल विस्फोट में 17 लोग मरे और अत्यधिक नुकसान हुआ। 2023 में हिमांचल प्रदेश में मंडी, कुल्लू और किन्नौर में हुए बादल विस्फोट में 18 लोग मरे और संरचनात्मक विनाश हुआ। 

जुलाई, 2025 में हिमांचल प्रदेश में बादल विस्फोट से 16 लोग मरे और भारी नुक़सान हुआ। अगस्त ,2025 में  उत्तराखंड के उत्तर काशी के धराली गांव में हुए भयंकर बादल विस्फोट से आए भूस्खलन एवं बाढ़ से इस क्षेत्र का भूगोल ही बदल गया। काफी धन -जन का नुक़सान हुआ। जुलाई, 2026 में हिमांचल प्रदेश में कुल्लू के गारसर शिलनाला क्षेत्र में हुए बादल विस्फोट से अत्यधिक नुकसान हुआ। जुलाई,2026 में ही जम्मू - कश्मीर के डोडा जिले के यात्री कस्बा में बादल विस्फोट काफी नुकसान उठाना पड़ा है।

आंकड़ों के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि 9 वर्षों से पहले के 46 वर्षों में बादल विस्फोट की मात्र 30 घटनाएं हुई हैं, किंतु इधर के 9 वर्षों में ही बादल विस्फोट की 8 भयंकर घटनाएं हुई हैं, जिसका मुख्य कारण जलवायु  परिवर्तन  एवं ग्लोबल वार्मिंग, पर्वतीय संरचना में बदलाव, वन विनाश एवं अनियोजित विकास का होना है।

बादल विस्फोट से बचाव :-
 वैसे तो बादल विस्फोट से सुरक्षा का एक मात्र उपाय इससे अपना बचाव करना ही है, किंतु अकस्मात इस घटना से बचाव करना भी मुश्किल होता है। बार भी विषय - विशेषज्ञों द्वारा बताए गए कुछ उपायों को अपनाकर कर इससे होने वाली जन - धन की क्षति हो कम तो किया ही जा सकता है। जैसे -प्राचीन भूस्खलन वाले क्षेत्रों, नदी - नालों द्वारा छोड़े गये मार्ग तथा  नदी - नालों के किनारे घर नहीं बनाना चाहिए। सड़क निर्माण सके समय आवरण प्रस्तर को सुरक्षित रखने के उपायों एवं विधियों का प्रयोग करना चाहिए।

 सड़क निर्माण अथवा अन्य संरचनात्मक ढांचे के निर्माण के दौरान भौमिकीय एवं पर्यावरणीय पहलुओं का अध्ययन करने के उपरांत ही ऐसे निर्माण कार्य की अनुमति प्रदान करनी चाहिए। किसी भी संरचनात्मक ढांचे के निर्माण की मजबूती पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पहाड़ों पर सिढ़ीदार खेती करते समय खड़ी ढालों पर निर्माण से बचना चाहिए तथा वेदिकाओं का निर्माण सुनियोजित तरीके से करना चाहिए। खड़ी ढलानों पर परम्परागत सिढ़ीदार खेती न करके बागवानी को प्रोत्साहित करना चाहिए। 

स्थानीय लोगों में भू - स्खलन, समर्पण, अपरदन, वेदिका निर्माण एवं भूमि उपयोग आदि से संबंधित तथ्यों के प्रति जानकारी हेतु प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम संचालित किया जाना चाहिए। स्थानीय लोगों को निरन्तर अद्यतन मौसम संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना चाहिए। स्थानीय जनता को बादल फटने के आपदा से पूर्व, आपदा के दौरान तथा आपदा के पश्चात होने वाली घटनाओं, दुर्घटनाओं, परिघटनाओं, खतरा जोखिम से बचने के उपाय  तथा सतत विकास जन्य तथ्यों से सदैव अवगत कराते रहना चाहिए।
                                             
                                             डॉ. गणेश कुमार पाठक
                                                      पर्यावरणविद 

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