एल नीनो एवं भारतीय मानसून

विश्व के मौसम सहित भारतीय मानसून पर भी पड़ता है महत्वपूर्ण प्रभाव: डाॅ. गणेश पाठक 
'एल नीनो' या जिसे 'अल नीनो' भी कहा जाता है, मौसम संबंधी एक ऐसी घटना है, जिसके तहत खासतौर से भूमध्य रेखीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में असामान्य रुप से एक संकीर्ण गर्म समुद्री धारा की उत्पत्ति होती है। इस गर्म जल धारा की उत्पत्ति दिसम्बर माह के अंत में पेरू के तट पर होती है। इस प्रकार एल नीनो उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त क्षेत्र में महासागरीय वायुमंडल प्रणाली का एक ऐसा दोलन, जिसका विश्व के मौसम सहित भारतीय मानसून पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

                     डॉ. गणेश कुमार पाठक
                           पर्यावरणविद 

 स्पेनिश भाषा में नीनो का तात्पर्य 'शिशु क्राइस्ट' से होता है। चूंकि एल नीनो की घटना भी क्रिसमस के आस -पास ही घटित होती है, इसी लिए इसे 'शिशु क्राइस्ट' कहा जाता है। एल नीनो के प्रभाव से समय- समय पर बाढ़ एवं सूखा दोनों आते रहते हैं। एल नीनो की महत्वपूर्ण घटनाओं में 1982 -83, 1097 -98 एवं 2009 -10 में आया एल-नीनो का प्रभाव विशेष प्रभावशाली रहा है।

 इस वर्ष अर्थात् 2026 -27 में भी मौसम वैज्ञानिकों  द्वारा ऐसा आकलन किया गया है कि इस वर्ष एल-नीनो विशेष रूप से प्रभावशाली रहेगा एवं भारतीय मानसून को प्रभावित करेगा। जिसके चलते 60 से 80 प्रतिशत तक ही मानसूनी वर्षा हो सकती है। मानसून में हो रहे विलम्ब के चलते यह आकलन बलवती भी होता जा रहा है। किंतु इधर मौसम वैज्ञानिकों द्वारा पुनः यह आकलन व्यक्त किया गया है कि अब एवं नीनो भूमध्य रेखीय प्रशान्त क्षेत्र में ही केंद्रित हो गया है और हिंद महासागर की तरफ बढ़ने की सम्भावना कम है, जिससे मानसून की आगे बढ़ने की गति में अब तेजी आयेगी और दक्षिणी पश्चिमी मानसून गति पकड़ कर दो -तीन दिन के अंदर वर्षा प्रदान कर सकता है। यह आकलन 24 जून का है और प्रख्यात भूगोल वेत्ता प्रो० सविन्द्र सिंह ने भी अपने यूं टूब पर इस बात की पुष्टि की है और चित्र द्वारा इसे स्पष्ट भी किया है।

 एल नीनो के भारतीय मानसून पर प्रभाव को इस रूप में देखा जा सकता है कि कुछ वर्षों में एल नीनो गर्म जल धारा जब अप्रत्याशित रूप से अत्यन्त गर्म हो जाती रही है तो भारतीय मानसून को प्रभावित करती है, जिससे मानसून आगे नहीं बढ़ पाता से और कमजोर हो जाता है, फलत: मानसूनी वर्षा कम होती है और सूखे की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। मौसम वैज्ञानिकों द्वारा इस वर्ष भी ऐसी ही संभावना व्यक्त की गयी है। किंतु 24 जून को किए गये एक आकलन में कुछ सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है और एल-नीनो के हिंद महासागर की तरफ आगे न बढ़ने से भारतीय मानसून के आगे बढ़ने की उम्मीद बढ़ गयी है और आज आकाश में दिखाई देने वाले बादल इसके प्रमाण भी हैं। संभावना है कि 28 जून तक मानसूनी वर्षा हो भी जाए।

 यदि विगत 100 वर्षों के एल नीनो के प्रभाव संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह तथ्य सामने आता है कि इन 100 वर्षों में भारतीय मानसून 43 वर्ष कमजोर रहा है, जिससे वर्षा कम हुई है। मात्र 19 वर्षों में इसका संबंध एल नीनो से स्थापित माना जा सकता है, जबकि 6 ऐसे एल नीनो वर्ष आए हैं, जब भारतीय मानसून अत्यधिक प्रबल स्थिति में रहा है।

 इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय मानसून को एल नीनो की घटना  निश्चित तौर पर प्रभावित करता रहा है। फिर भी जलवायु एवं मौसम परिवर्तन के वर्तमान दौर में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वैसे कहा भी गया है कि 'मौसम तो क्षण भर में बदल जाता है'। जब बादल बरसेंगे, तभी हम समझेंगे कि मानसून आ गया। अभी तो बस इंतजार ही है।
(नोट - सभी चित्र गुगल से साभार)

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