महाराणा प्रताप जयंती 9 मई 2026 विशेष प्रस्तुति

महाराणा प्रताप का संघर्ष आज भी है प्रासंगिक: प्रो. सन्तोष प्रसाद गुप्त
महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के महानतम योद्धा जो वीरता, बलिदान तथा देशभक्ति के प्रतीक माने जाते है। महाराणा प्रताप (1540-1597) मेवाड़, राजस्थान के सिसोदिया राजवंश के 13वें राजपूत शासक थे। इनका जन्म राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में 09 मई 1540 को हुआ था। इनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह द्वितीय तथा माता का नाम जयवंता बाई था। इनके बचपन का नाम भील समुदाय द्वारा कीका रखा गया था।

महाराणा प्रताप का राजस्थान, उदयपुर (चावण्ड) जिनकी राजधानी थी। जहॉ 28 फरवरी 1572 को राज्याभिषेक किया गया था। इनकी जीवन संगनी अजबदे पंवार सहित 11 पत्नियां थी तथा अमर सिंह सहित कुल 17 पुत्र थे।महाराणा प्रताप अपने वीरता, साहस और बादशाह अकबर के सामने न झुकने के लिए अमर है। उन्होंने भीलों के साथ मिलकर मुगलों से संघर्ष किया। हल्दी घाटी तथा दिवेर जैसे युद्धों में भारतीय इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया। 

महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी का युद्ध 18 जून 1976 को बादशाह अकबर के मुगल सेना का नेतृत्व कर रहे सेनापति मानसिंह तथा महाराणा प्रताप के बीच लड़ा गया, कड़े संघर्ष के बावजूद राणा ने हार नहीं मानी अपने प्रिय घोड़ा चेतक तथा हाथी रामप्रसाद (भगवान राम का उपहार) तथा सूरवीर भामाशाह, भील समुदाय इत्यादि के मदद से प्रतिरोध किया। दिवेर के युद्ध 1582 में भी राणा प्रताप ने मुगलों का करारी शिकस्त दी। कर्नल टाड ने इस युद्ध की तुलना ‘मैराथन’ से की। अकबर के कई दूतों के आने के बावजूद भी प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करना मना कर दिया और जीवन भर स्वाधीनता के लिए लड़े। 

महाराणा प्रताप अपने दृढ इच्छा शक्ति और प्रजापालक के लिए जाने जाते है। इनका व्यक्तित्व, सादगीपूर्ण लेकिन युद्ध के मैदान में अत्यन्त भयानक हो जाता था। कहा जाता है कि वे 80 किलों का भाला लेकर चलते थे। उन्होंने अपना जीवन मेवाड़ के गौरव की रक्षा के लिए न्यौछावर कर दिया।महाराणा प्रताप के परममित्र सलाहकार, सेनापति, दानवीर भामाशाह थे जिन्होंने हल्दी घाटी युद्ध 1576 के बाद महाराणा प्रताप की आर्थिक सहायता कर मुगलों के खिलाफ सारी सम्पत्ति दान कर दी थी। दानवीर भामाशाह महाराणा प्रताप के साथ कई युद्धों में भाग भी लिया था। 

जब महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे तो भामाशाह ने ही उन्हें दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें तथा 25 लाख रूपये नकद दान कर सहायता की थी जिससे सैनिकों को 12 वर्ष तक खर्च का निपटारा किया जा सके। महाराणा प्रताप कठिन परिस्थितियों में भी जंगलों में रहकर स्वतंत्रता की रक्षा की। जिनकी नीतियां शिवाजी महाराज से लेकन ब्रिटिश के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी। आज के युग में भी महाराणा प्रताप का संघर्ष प्रासंगिक है।

                                 प्रोफेसर सन्तोष प्रसाद गुप्त
                                           विभागध्यक्ष
                                       अर्थशास्त्र विभाग
                         श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर
                              महाविद्यालय, बलिया (उ0प्र0)
                                      मो0-9450286159, 
                                             9450777079

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