Monday, January 12, 2026

मां गंगा की अविरलता, निर्मलता एवं प्रदूषण मुक्त करने हेतु लिया गया संकल्प

धूमधाम से मनाई गई गंगा पुत्र भीष्म पितामह एवं स्वामी विवेकानन्द की जयंती
बलिया। भीष्म पितामह एवं स्वामी विवेकानंद जयंती के शुभ अवसर पर सोमवार को श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया के मनोरंजन हाल में गंगा पुत्र भीष्म पितामह की जयंती एवं स्वामी विवेकानन्द की जयंती धूम - धाम से मनाई गयी। 

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो० गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, मुख्य वक्ता उत्तर - प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ल एवं विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध समाजसेवी राजीव उपाध्याय रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो० अशोक कुमार पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम का संचालन अरविंद शुक्ल एवं धन्यवाद ज्ञापन करुणानिधि तिवारी ने किया।

 कार्यक्रम के दौरान गंगा समग्र गोरक्ष प्रान्त के शैक्षिक आयाम प्रमुख  डाॅ० गणेश कुमार पाठक ने मां गंगा की अविरलता, निर्मलता एवं प्रदूषण मुक्त करने हेतु गंगा पुत्र भीष्म पितामह को साक्षी मानकर  कार्यक्रम में सम्मिलित विद्वतजनों, बुद्धिजीवियों एवं अन्य भाई - बहनों को संकल्प दिलाया।

मां गंगा के प्रति स्वामी विवेकानंद एवं गंगा पुत्र भीष्म पितामह के विचार: डाॅ० गणेश पाठक

मां गंगा के प्रति स्वामी विवेकानंद जी के विचार
स्वामी विवेकानंद जी के लिए मां गंगा  मात्र एक नदी नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक आत्मा, संस्कृति एवं पवित्रता का प्रतीक है। स्वामी जी के विचार गंगा के प्रति गहरे सम्मान, अथाह प्रेम एवं आध्यात्मिक अंतर्संबंध को प्रकट करते हैं। स्वामी जी के अनुसार गंगा एक ऐसी पवित्र नदी है, जिसमें स्नान करने एवं तट पर रहने मात्र से ही आध्यात्मिक शुद्धि एवं मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। 

उनका विचार था कि -' गंगा तव दर्शनात मुक्ति:'। अर्थात् गंगा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि ध्यान हेतु स्वामी जी को गंगा तट का शांत वातावरण विशेष प्रिय था।

स्वामी जी के अनुसार गंगा सदियों से सनातन सभ्यता एवं संस्कृति की गवाह रही है। सभ्यता एवं संस्कृति का विकास गंगा के किनारे ही हुआ। भारत की धार्मिक - आध्यात्मिक एकता को कायम रखने में गंगा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गंगा पवित्रता की प्रतीक है।

  स्वामी जी को गंगा से व्यक्तिगत एवं भावनात्मक लगाव था। यही कारण है कि उनके प्रवचनों, व्याख्यानों एवं पत्रों में उनके द्वारा प्राय: प्रेरणादायक एवं शांतिपूर्ण दृश्यों का वर्णन किया गया है, जो उन्हें ईश्वर के निकट होने का बोध कराता है। गंगा के प्रति अपने आध्यात्मिक पक्ष को सुदृढ़ करते हुए एक जिम्मेदार एवं जागरूक आचरण की प्रेरणा देते हुए गंगा को स्वच्छ रखते हुए प्रदूषणमुक्त रखने का संदेश देते हैं। 

गंगा के प्रति भीष्म पितामह के विचार-
भीष्म पितामह मां गंगा को एक पवित्र देवी के रूप में मानते थे एवं तद्नुसार  पूजा - अर्चना थे।। वे अपनी जननी के रूप में मां गंगा से अगाध प्रेम करते थे।।एक दिव्य देवी के रूप में मां गंगा को पवित्र एवं पूज्य मानते हैं। भीष्म पितामह मां गंगा को एक पथ प्रदर्शक एवं शिक्षक के रूप में देखते एवं मानते थे। अपने समक्ष विकट परिस्थिति उत्पन्न होने पर उनके उपदेशों को याद किया करते थे तथा एक जननी के रूप में मां गंगा के निर्णय का उन्होंने सदैव सम्मान किया। 

इस तरह भीष्म पितामह के लिए मां गंगा एक दैवीय शक्ति, मां का प्यार एवं एक आदर्श गुरु की संगम थी, जिनका भीष्म द्वारा सदैव आदर एवं सम्मान किया गया।

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